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बीबीसी विशेष: कैसी आज़ादी

August 17, 2010

बीबीसी विशेष: कैसी आज़ादी

पारुल अग्रवाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत की आज़ादी की 63वीं सालगिरह पर बीबीसी आप तक पहुंचा रहा है कुछ विशेष कहानियाँ.

कहानियां कुछ ऐसे लोगों की जो लगातार इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या वो वाकई आज़ाद हैं ?

हमारे जन्म पर मातम न हो…

”मेरा नाम रागिनी है (परिवर्तित नाम). मैं पेशे से एक डॉक्टर हूं. हम भले ही 63 साल से आज़ादी मना रहे हों लेकिन भारत में जिन बेटियों को जन्म लेने का भी हक नहीं, उनके लिए आज़ादी के कोई मायने नहीं हैं.

जनवरी 2005 में जब मैं गर्भवती हुई तो मेरे पति ने मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ मेरा गर्भ परीक्षण करवाया. पता चला कि मेरे गर्भ में जुड़वां लड़कियां है. ऐसे में मेरे पति जो ख़ुद एक डॉक्टर हैं, ने मुझसे कहा कि मैं तुरंत गर्भपात करवा लूं.

मैंने अपनी बेटियों की हत्या करने से मना कर दिया. इस गलती की सज़ा के तौर पर कई दिनों तक मुझे भूखा रखा गया. मुझे पानी भी नहीं दिया जाता था. इन ज़्यादतियों के बीच चार महीने बीत गए. एक दिन पति ने मुझे सीढ़ियों से धक्का दे दिया. काफ़ी खून बहने के बावजूद अस्पताल ले जाने कि बजाय मुझे एक कमरे में बंद कर दिया गया. पति चाहते थे कि किसी तरह मेरा गर्भपात हो जाए.

जन्म पर मातम

अपनी अजन्मी बेटियों की जान को ख़तरा देखते हुए मैं अपने मायके आ गई. 11 अगस्त को मेरी बेटियों का जन्म हुआ और पति के काफ़ी कहने पर मैं उनके घर आ गई. लेकिन अब मुझ पर दबाव बनाया जाने लगा कि मैं एक बच्ची को गोद दे दूं. दो साल बीत गए और एक दिन पति ने मुझे घर से निकाल दिया.

इसके बाद मैंने ‘प्री नेटल डायगनॉस्टिक टेकनीक्स एक्ट’ (पीएनडीटी एक्ट) के तहत अपने पति के ख़िलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. ये कानून कहता है कि गर्भ में लिंग परीक्षण कराना गैर कानूनी है.

कानून भले ही कहता है कि भारत में औरतों को बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, उन्हें इज़्ज़त मिलनी चाहिए लेकिन हमारी व्यवस्था और उसके लोग इन कानूनों पर अमल नहीं करते.

समाज की पुरुषवादी सोच मुझे अपने हक के लिए लड़ने नहीं देती. ये सोच कहती है कि गलती मेरी है कि मैंने गर्भपात नहीं कराया और अपने पति के हाथों बेटियों को मरने नहीं दिया. रागिनी (परिवर्तित नाम)

समाज की पुरुषवादी सोच मुझे अपने हक के लिए लड़ने नहीं देती. ये सोच कहती है कि गलती मेरी है कि मैंने गर्भपात नहीं कराया और अपने पति के हाथों बेटियों को मरने नहीं दिया.

निगरानी समिती के एक चिकित्सा अधिकारी ने ख़ुद मुझसे कहा कि मैं अपने पति के पास वापस चली जाऊं और बेटे को जन्म देने के लिए एक बार फिर कोशिश करूं.

औरतों के लिए आज़ादी का तब तक कोई मतलब नहीं होगा जब तक उनकी पैदाइश पर मातम मनाया जाएगा.”

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